अहम और यथार्थ के बीच उलझी नीतीश की राजनीति

      बिहार में सत्ता के गाड़ी की स्टियरिंग संभाले नीतीश कुमार अपने पूरे राजनैतिक जीवन के सबसे संघर्षपूर्ण काल से गुजर रहे हैं। वर्तमान में उनके समक्ष एक तरफ जहां अपने राजनैतिक अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद है वहीं दूसरी ओर जनता के बीच अपनी गिरती हुई छवि को पुन: स्थापित करने की चुनौती।  बड़े भाई की भूमिका से अचानक भाजपा के सामने छोटे भाई की भूमिका में पहुंच चुके नीतीश कुमार एक तरह से बिहार में जनता के द्वारा नकार दिए गए हैं। बावजूद  उनके अंदर का अहम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करने दे रहा। 
          अब तक के बिहार के राजनीति की सच्चाई रही है कि नीतीश कुमार एन.डी.ए में हमेशा अपने मन की करते रहे हैं और सुशील मोदी के माध्यम से भाजपा में अपनी हर बात मनवा कर राजनीति करते रहे। लेकिन 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव ने स्पष्ट कर दिया है कि अब जनादेश भाजपा के पक्ष में है और नीतिश कुमार के चेहरे को जनता ने नकार दिया है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी सुशील कुमार मोदी के साथ नीतीश कुमार की केमेस्ट्री को भलीभांति समझ लिया है जो बिहार में भाजपा कार्यकर्ताओं और जनमन के अनुकूल है। शायद भाजपा नेतृत्व ने सुशील कुमार मोदी को राज्यसभा भेंजकर अपनी भावी रणनीति का स्पष्ट संकेत दे दिया है। सुशील कुमार मोदी को बिहार की राजनीति से दूर कर दिल्ली का रास्ता दिखाना, उनकी जगह दो-दो उप-मुख्यमंत्री बनाया जाना - यह सब बिहार में भाजपा की एक नई पीढ़ी को आगे लाकर भविष्य की राजनीति को रणनीतिक रूप से ज्यादा आक्रामक और धारदार बनाने की दिशा का संकेत देता है जो नीतिश कुमार के इशारों पर न चलकर उनकी आँखों में आँखें डालकर श्रेष्ठ भाव से शासन की गाड़ी पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सके। 
          सुशील कुमार मोदी के दिल्ली चले जाने से अब नीतीश कुमार भाजपा के साथ अपनी शर्तों पर सरकार चलाने में असहजता महसूस कर रहे हैं। क्योंकि सुशील कुमार मोदी के उप-मुख्यमंत्री रहते नीतीश कुमार के लिए अपनेे एजेण्डे पर काम करना आसान था। वो अपनी हर बात भाजपा से मनमाने तरीके से मनबानेे में सफल हो जाते थे कारण कि सुशील कुमार मोदी उनके साथ थे। इससे भाजपा को दो प्रकार के नुकसान हो रहे थे - पहला, सरकार का श्रेय सिर्फ नीतिश कुमार को मिल रहा था, भाजपा की भूमिका जनता की नजरों में गौण होती जा रही थी। दुसरा, भाजपा के विशाल कार्यकर्ता समूूूह में प्रशासनिक कार्यालयों में अपनी उपेक्षा एवं उचित राजनैतिक भागीदारी को लेकर भारी असंतोष पनप रहा था और इन सब का कारण कार्यकर्ता सुशील कुमार मोदी को मान रहे थे। दबे जुबान तो सुशील कुमार मोदी को भाजपा में नीतिश कुमार की 'बी' टीम तक कहा जाने लगा था। 
      अब नीतिश कुमार के समक्ष यूटोपिया से निकलकर यथार्थ के जमीन पर सोंचने का समय है। अब उनके समक्ष दो ही विकल्प हैै, या तो अपने जनादेशिक हैैसियत का सम्मान करते हुए भाजपा को बड़ा भाई मानकर चले,जो शायद उनकी महत्वाकांंक्षाा और अहम (इगो) उन्हें ऐसा करने की अनुमति न दे या भाजपा सेे अलग हो जाए। यहाँ दोनो ही स्थितियों में नीतिश कुमार के समक्ष एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है। यदि वह भाजपा को अपना बड़ा भाई मान कर सरकार चलाते हैं तो उनकी भूमिका धीरे-धीरे बिहार के प्रशासन से गौण होने का खतरा है और यदि अलग होने की दिशा में सोंंचते हैं तो  उनके समक्ष अपने राजनैतिक अस्तित्व को बचाए रखने का खतरा है। एक तरह से कहा जाए तो उनकी संपूर्ण राजनैतिक हस्ती के ही मिट जाने की संभावना से इंकार नही किया जा सकता। 
        सवाल  सिर्फ सरकार चलाने का नहीं है बल्कि  भविष्य में नीतीश कुमार की राजनीति की दशा-दिशा क्या होगी - ज्यादा महत्वपूर्ण है। नीतीश कुमार को 2024 का लोकसभा चुनाव दिख रहा है । 2019 में लोकसभा में उनके 2 सीट होने के बावजूद भी भाजपा ने बिहार में आधी सीट उन्हें दे दी । यहाँ तक की भाजपा ने अपने पांच सिटिंग सांसदों की टिकट काटकर नीतिश कुमार को 17 सीटें देकर बराबरी का हिस्सेदार बनाया  और सफलता भी मिली। पुन: 2020 के विधान सभा चुनाव में भाजपा से एक सीट अधिक लेकर बड़े भाई होने का संदेश देने में कोई कोर कसर नही छोड़ा, यह सब जानते हुए कि गठबंधन में एक सीट कोई मायने नही रखती यद्यपि उसके पीछे का भाव मायने रखता है। और यह सब संभव होने के पीछे सुशील कुमार मोदी से उनकी अच्छी केमेस्ट्री से इंकार नही किया जा सकता। यह सब तब हुआ जब भाजपा के आंतरिक सर्वेक्षण से लेकर मीडिया तक ने बिहार में जनमानस भाजपा के पक्ष में एवं नीतिश कुमार के विरूद्ध होने का साफ - साफ संकेत दिया था। यहां तक कि बिहार की राजनीति पर पैनी नजर रखनेवाले भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं ने भी अपने आंकलन के आधार पर अकेले चुनाव लड़ने को उचित समय होने का सुझाव रखा था। यद्यपि ऐसा संभव नहीं हो सका और इसके पीछे भी कहीं न कहीं सुशील कुमार मोदी की भूमिका मानी जा रही थी। 
           परंतु 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम ने एक साथ कई चीजें स्पष्ट कर दी है। अब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व भविष्य के चुनाव में नीतिश कुमार को आधे का हिस्सेदार बनाने की स्थिति में नहीं दिख रहा है, क्योंकि अब जो भी सीटें तय होंगी विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के चुनाव में प्राप्त जनादेश की ताकत के अनुसार। ऐसे में निश्चित रूप से नीतीश कुमार को भाजपा के समक्ष झुकना पड़ेगा और कम सीटों पर संतोष करना पड़ेगा जो उन्हें कतई मंजूर नहीं होगी। वर्तमान में मंत्री परिषद् में मंत्रियों की संख्या को लेकर भी पेंच फंसने की संभावना है । भाजपा जहां विधायकों की संख्या के समानुपातिक आधार पर मंत्रियों की संख्या चाहेगी वहीं नीतीश कुमार कम सीट लाकर भी बड़े भाई की भूमिका में दिखने की कुंठा को तृप्त करने की मानसिकता से प्रेरित होकर एक बार फिर सीट शेयरिंग की भांति बराबर - बराबर हिस्सेदारी के लिए लालायित होंगे। परन्तु वर्तमान परिस्थिति में  भाजपा  के लिए ऐसा प्रस्ताव  स्वीकार करना असंभव-सा प्रतीत होता है। क्योंकि, ऐसा किए जाने पर भाजपा कार्यकर्ताओं एवं मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाएगा। ऐसे में अत्यधिक जनादेश के बावजूद भी नीतीश के सामने भाजपा के कमजोर सिद्ध होने के संदेश का खतरा भाजपा के शीर्ष रणनीतिकारों को मंजूर नहीं होगा। क्योकि बिहार में भाजपा अपने मजबूत भविष्य को देख रही है। बिहार में भाजपा का बढ़ता जनाधार उसे आत्मनिर्भर होने का संकेत देता है। बिहार का जनमानस भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार चाहता है। आनेवाले समय में भाजपा के रणनीतिकारों को इस दिशा में सोंचने की विवशता होगी और जरूरत भी। इस बात से नीतिश कुमार भी अनभिज्ञ नही होंगे क्योंकि वो राजनीति के मजे हुए खिलाड़ी हैं। 
         फिलहाल  सदन के अंदर तो नीतीश कुमार अपनी संख्या नहीं बढ़ा सकते हैं इसलिए सदन के बाहर जातीय नेताओं के साथ गोलबंदी बढ़ाकर यह संदेश देना चाहते हैं कि उनके  पास भी भाजपा से कमतर जनाधार नहीं है । आगामी 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ सीट बंटवारे में अपने को मजबूत दावेदार के रूप में फिर से बराबर की हिस्सेदारी का दावा कर सकें इसी क्रम में उपेंद्र कुशवाहा, नागमणि एवं अरुण कुमार सिंह जैसे अपने धुर विरोधीयों (सभी राजनैतिक रूप से हाशिए पर) के साथ मिलकर नए राजनैतिक समीकरण को साधने की दिशा में अग्रसर दिखते हैं। ये ऐसे लोग हैं जो मास-लीडर तो नहीं बन पाए कास्ट-लीडर बनने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु बिहार की जनता ने  2020 के  बिहार विधानसभा चुनाव में सिद्ध कर दिया है कि जातीय नेता जहां भी जाएं उनकी जाति के मतदाता उनके साथ जाते नही दिख रहे हैं । ऐसे नेता अपने स्वार्थ के लिए गठबंधन बनाते हैं । उससे उसके जात बिरादरी को तो कोई फायदा नही ही होता बल्कि राज्य और राष्ट्र का भी कुछ भला नही हो पाता।  यदि नीतीश कुमार को ऐसा लगता है कि जातीय नेताओं का शो-केस दिखाकर अपने जनाधार का आभासी प्रतिशत बढ़ाकर आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के आधी सीटों की बार्गेनिंग करने में वो सफल हो पाएंगे तो शायद यह उनकी भारी मानसिक भूल होगी। क्योंकि 2020 के चुनाव ने सिद्ध कर दिया है कि कोई भी नेता अपनी जाति का वास्तविक ठेकेदार नही है। दुसरी बात, वर्तमान समय में भाजपा ने  सभी जाति और वर्ग में अपने जनाधार को मजबूत किया है। उसके सर्वव्यापी और सर्वसमावेशी सांगठनिक स्वरूप ने सर्वसमाज में  प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं और भविष्य के लिए अग्रिम पंक्ति के स्थानीय नेताओं को भी तैयार किया है।
            2020 का विधान सभा चुनाव नीतिश कुमार के चेहरा और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के काम पर लड़ा गया। जिस प्रकार बिहार की जनता ने मोदी के काम पर मोहर लगाया और  नीतिश कुमार के चेहरे को खारिज करनेवाला जनादेश दिया है वो भविष्य की राजनीति के लिए साफ संकेत है। यह पॉलिटिकल पंडितों के ज्ञान पर निर्भर करता है कि इस जनादेश से कौन क्या संदेश ग्रहण करता है। यदि 2024 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार एन.डी.ए से बाहर होकर अकेले (जिसकी कम संभावना है) अथवा नव-जातीय समीकरण के साथ चुनाव मैदान में उतरते हैं तो शायद राजनैतिक दृष्टिकोण से बिहार की राजनीति से वे परे जाते हुए दिखाई पड़ेंगे और इसके साथ ही राजनीति के एक युग का अंत भी....‼️ 🖌

🇮🇳अनिल कुमार यादव🇮🇳 
🌹प्रशासनिक व राजनीतिक विश्लेषक🌹 

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